Sunday, June 2, 2019

जब हनुमानजी ने श्रीरामजी के साथ जाना अस्वीकार कर दिया!

श्रीरामावतार में जब नारायण अपनी लीला समभरण कर अपने दिव्य साकेत लोक को जा रहे थे, तब उनके साथ समस्त अयोध्यावासी, उनके परिकर, सेवक सभी उनके साथ जाने को सरयुजी के तट पहुँचे, सभी को जाते देख कर हनुमानजी भी सरजू तट पहुंचे परंतु हनुमानजी एक किनारे पर हाथ जोड़ कर खड़े थे। जब यह दृश्य रामजी ने देखा तो हनुमान जी से बोले हनुमान तुम तो हमारे परम प्रिय भक्त हो (रघुपति प्रिय भक्तं) हमारे साथ हमारे साकेत लोक नहीं चलोगे?

हनुमानजी ने कहा की प्रभु एक बात बताइये, आप के उस दिव्य साकेत लोक में मुझे आप की कथा सुनने को मिलेगी या नहीं? श्रीरामजी ने कहा वहाँ न तो कथा वक्ता है और न ही वहाँ कोई कथा होती है, पर वहाँ मै तो तुम्हे प्राप्त रहूँगा।
हनुमानजी ने कहा कि हे प्रभु आप तो मुझे मेरे ह्रदय  पटल में धनुष बाण लिए नित्य प्राप्त हो (जासु ह्रदय आगार बसहि राम सरचाप धर), पर यदि किसी स्थान में आप की कथा न हो, आप के गुणानुवादो का गान न हो, तो ऐसा स्थान मेरे किस काम का? मुझे तो केवल आप की गुणो, कथाओ, और लीलाओ को श्रवण करने में ही आनंद आता है (1. यत्र-यत्र रघुनाथ कीर्तनं तत्र-तत्र कृत मस्त कांचनम। 2 राम चरित सुनिबे को रसिया)। 

 हनुमानजी कहते है कि हे प्रभु मुझे तो जहाँ-जहाँ आपकी कथा होती है वहाँ बिन बुलाय जाने में भी आनंद है। जिस स्थान में आपकी कथा होती है मुझे उस स्थान में जा कर किसी कोने में बैठ कर आप की कथा श्रवण करने में ही आनंद आता है। अतः आप साकेत लोक पधारिये मुझे यही रह कर अपनी कथा का दिव्य आनंद प्रदान कराते रहिये। हनुमानजी की बातें सुन कर रामजी अत्यंत प्रसन्न हुए। रामजी ने हनुमानजी को अपना प्रिय भक्त ( रघुपति प्रिय भक्तं) और  चिरंजीव होने का आशीर्वाद दे कर अपने साकेत लोक को प्रस्थान किये। 

इस प्रकार हनुमान जी ने श्रीराम जी के साथ उनके दिव्य बैकुंठ लोक जाना अस्वीकार कर दिया और यही धारा धाम में रह कर यत्र-तत्र विचरण कर भगवान् की कथाओ का नित्य श्रवण करने लगे और आज भी जहाँ-जहाँ भगवान् की कथा होती है हनुमानजी उस स्थान पर उपस्थित होते है और कथा श्रवण करते है।


Tuesday, May 21, 2019

विवाह के सात वचन जो क़ि कन्या अपने होने वाले पति से लेती है!!

हमारे सनातन हिन्दू धर्म के अनुसार पत्नी अपने पति से विवाह पूर्व सात वचन लेती है जिसे पति को जीवन भर निभाने का वचन देना होता है। प्रायः ये वचन विवाह संपन्न कराने वाले पंडित जी संस्कृत में या हिन्दी में पड़ कर विवाह के समय सुना देते है। आइये जाने विवाह के समय पत्नी द्वारा अपने पति से लिए जाने वाले वे सात वचन क्या है:-
1 पहला वचन (धार्मिक कार्यो में सहभागिता) :- हमारे सनातन हिन्दू धर्म में धर्म कर्म की प्रधानता है और चार पुरुसार्थ में भी धर्म का स्थान पहला है। अतः पत्नी अपने पति से पहले वचन के रूप में यह वचन लेती है की आप मुझे अपने प्रत्येक धर्म-कर्म के कार्यो में सामान सहभागी बनाएंगे। आप कोई भी पूजन भजन जप तप अथवा तीर्थ यात्रा का कोई कार्य मेरे बिना नहीं करेंगे। इस वचन का कारन यह है की पति और पत्नी के बीच सामान धर्म-कर्म कर सामान पूण्य फल की प्राप्ति करना है।
2 दूसरा वचन (अपने मायके के प्रति सम्मान) कन्या विवाह के बाद अपने पुराने परिवार को छोड़ कर अपना एक नया परिवार बसाती है, परंतु अपने मायके से उसे सामान भाव से प्रेम और स्नेह होता है। अपने दूसरे वचन में पत्नी अपने पति से यह वचन मांगती है की जिस प्रकार मै अपने पुराने घर को छोड़ कर आप के घर आ रही हूँ, आपके माता-पिता और सगे-संबंधियो को अपना रही हूँ उसी प्रकार आप भी मेरे माता-पिता और सगे संबंधियो को उसी भाव से अपनाएंगे। इस वचन का कारण यह है की पति-पत्नी के बीच परस्पर तालमेल बना रहे।
3 तीसरा वचन (हर परिस्थिति में साथ):- जीवन के तीन बड़े ही महत्वपूर्ण पड़ाव माने गए है-बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था। अगले वचन के रूप में पत्नी अपने पति से वचन लेती है की आप मेरी हर अवस्था में सामान भाव से साथ निभाएंगे। पत्नी को जीवनसंगिनी कहा जाता है अतः आप जीवन भर मेंरा साथ निभाएंगे। भविष्य में यदि मेरे साथ कोई दुर्घटना अथवा शरीरिक अक्षमता या कोई विकृति आती है तब भी आप मेरा साथ निभाएंगे। इस प्रकार तीसरे वचन से पत्नी अपने पति को अपने प्रति जिम्मेदारी का अहसास कराती है।
4 चौथा वचन (जीविकोपार्जन):- हमारे सनातन हिन्दू धर्म में मुख्यतः पति का कार्य धनोपार्जन करना और पत्नी का का कार्य गृहस्थी का संचालन करना होता है। पत्नी अपने पति से कहती है की आप मेरे और अपने परिवार की जीविकोपार्जन के लिए धर्मानुसार कर्म करते हुए धनोपार्जन कर हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करे। इस वचन के द्वारा पत्नी अपने पति को अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारी का अहसास कराती है।
5 पाचवा वचन (आर्थिक सहभागिता) पांचवे वचन के रूप में पत्नी पति से वचन लेती है की किसी भी प्रकार का कोई भी आर्थिक लेंन-देंन आप मेरी जानकारी के बाहर नहीं करेंगे। आप पारिवारिक कार्यो के संचालन में मेरी सहायता लेकर ही कोई निर्णय लेंगे। आज के परिवेश में इस वचन का महत्त्व और भी बड़ जाता है। यदि पति का कोई दुर्घटना हो जाय तब ऐसी स्थिति में पत्नी घर गृहस्थी को आगे सफलता पूर्वक चला सके इस भावना से यह वचन लिया जाता है।
6 छठवा वचन (उत्तम चरित्र) पति-पत्नी के जीवन में परस्पर एक दूसरे के प्रति सम्मान और आदर का भाव हो इस भावना से पत्नी पति से छठे वचन के रूप में अपने प्रति सम्मान का वचन लेती है। पति जीवन भर पत्नी का सम्मान करे। उससे यदि किसी प्रकार की कोई गलती भी हो जाय तो सार्वजनिक रूप से उसे अपमानित न करे एकांत में उसे समझाए। कभी अपने पत्नी का अपमान न करे। पति के उच्च चरित्र की बात करते हुए पत्नी पति को जुआ, मदिरापान, नशा, परस्त्रीगमन आदि विकारो से दूर रहने का वचन लेती है। यह वचन आज के परिवेश में बहुत आवश्यक है क्योकि आज अधिकाँश दाम्पत्य जीवन इन दुर्विकारो के कारण टूट जाते है।
7 सातवा वचन (एक पत्नी व्रत):- विवाह के बाद दाम्पत्य जीवन अपने जीवन साथी के प्रति पूर्ण समर्पण और एकात्म भाव से ही सफल होता है। अतः इस भावना से पत्नी अपने पति से वचन लेती है कि आप जीवन भर केवल मुझ से ही सम्बन्ध रखेंगे। पराई किसी स्त्री के साथ आप नाता नहीं रखेंगे। परस्त्रीगमन नहीं करेंगे। पर स्त्री को अपनी माता के सामान समझेंगे।
हमारे सनातन हिन्दू धर्म ने विवाह को एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है। यह पति पत्नी के बीच एक पवित्र बंधन होता है जो विशवास और परस्पर सामंजस्य की बुनियाद पर होता है। विवाह का यह बंधन सनातन हिन्दू धर्म के रिति रिवाजो के साथ परिवार और समाज के उपस्थिति में संपन्न कराया जाता है। विवाह के समय अनेक प्रकार की वैवाहिक प्रक्रियाओ का पालन वर-कन्या के द्वारा किया जाता है, जिसमे एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है पत्नी के द्वारा पति से वचन लेना।

इसप्रकार विवाह के समय कन्या अपने वर से ये सात वचन लेती है ताकि उनका दाम्पत्य जीवन सुखमय हो सके। आज के इस परिवेश के हिसाब से भी ये सात वचन बहुत ही उपयोगी है क्योकि आज छोटी छोटी गलतफमियो और परस्पर सामंजस्य न होने की वजह से सम्बन्ध टूट जाते है। अतः हमारे सनातन हिन्दू धर्म के इस वैवाहिक दर्शन को समझ कर वर कन्या इन वचनो को आत्मसात कर एक सफल दाम्पत्य जीवन का निर्वहन कर सकते है।


Monday, May 20, 2019

शुन्य है जीवात्मा तो अंक है परमात्मा जाने कैसे?

एक बार की बात है अंक और शून्य आपस में बैठे हुए थे। शून्य ने अंक से कहा कि मेरे कारण ही कारण तू बड़ा बनता है। जैसे-जैसे मैं तेरे पीछे लगता हूँ तू दस गुना बढ़ता जाता है । उदाहरण के लिए 1 के आगे 0 लगा तो 10 हो गया 10 के आगे 0 लगा तो 100 हो गया, कहने का अर्थ है की 0 के लगने से अंक की शक्ति दस गुनी बड़ जाती है। 

तभी अंक ने कहा की तू चाहे मेरे पीछे जितनी बार भी लग ले पर यदि मैं तेरे सामने से हट गया तो तेरा कोई अर्थ नहीं है अर्थात यदि 10000000 में से केवल 1 हो हटा दिया जाय तो बाकी के सभी शून्य का कोई महत्त्व नहीं बचत वह केवल शून्य हो जाता है।

इसी प्रकार जीवात्मा और परमात्मा के लिए कहा गया है:-

राम नाम को अंक है, सब साधन है शून्य।
अंक गए कछु हाथ ना, अंक रहे दश गुन।।

इसी प्रकार का कुछ सम्बन्ध जीवात्मा और परमात्मा में भी है। अंक परमात्मा है और शून्य जीवात्मा। जब तक शून्य रूपी जीवात्मा के भीतर भगवान् रुपी अंक की शक्ति है तब तक ही जीवात्मा का अस्तित्व है, जिस दिन भगवान् अपनी शक्ति हमारे सामने से खीच लेंगें उस दिन हमारा अस्तित्व समाप्त हो जायगा। 

यह शरीर एक मशीन की तरह है जिसमे विविध प्रकार के उपकरण (पंच ज्ञानेन्द्रियाँ, पंच कर्मेन्द्रियाँ, पांच प्राण, मन, बुद्धि और अहंकार) लगे हुए है। जिस प्रकार लौकिक उपकरणों को संचालित करने के लिए विद्युत शक्ति की आवश्यकता होती है उसी प्रकार शरीर के इन उपकरणों को भी संचालित करने के लिए ईश्वर के अंश रूपी जीव शक्ति की आवश्यकता होती है। जब तक इस शरीर मे उस ईश्वर की शक्ति रूपी जीव का निवास है तभी तक इस शरीर का अस्तित्व है, जिस दिन यह शक्ति भगवान इस शरीर से निकाल लेते है उस दिन बड़े से बड़ा ज्ञानी, बलवान, रूपवान सभी मिट्टी के ढेर के रूप में परिणित हो जाते है।

अतः कभी अपने रूप, सौंदर्य, धन-दौलत, मान-सम्मान, गुण, ज्ञान आदि का अहंकार नहीं करना चाहिए। सभी कुछ भगवान् का दिया है और उनकी कृपा से ही मिला है, हमारा इसमें कुछ भी नहीं यह भावना मन में रखन चाहिए। कर्म और ज्ञान का अहंकार करने वालो का पतन निश्चित होता है। इसप्रकार भगवान सर्व शक्तिमान है, सर्वाज्ञ है, सर्व नियन्ता है, सर्वव्यापी है उनकी कृपा से ही जीव का अस्तित्व है। ईश्वर की शक्ति बिना जीव शून्य की ही भाँती है।


Saturday, May 18, 2019

हनुमानजी ने क्यों धारण किया पंचमुख?

हनुमानजी को प्रायः हमने एक मुख वाले स्वरुप में ही देखा है। पर कही कही हमें हनुमानजी पांच मुख वाले पंचमुखी स्वरुप में भी दिखाई देते है। पंचमुखी होने के पीछे की कथा रामायण काल के श्रीराम-रावण युद्ध के समय की है। आइये जाने क्यों हनुमानजी ने पांच मुख धारण किया और पंचमुखी कहलाये। 
हनुमानजी के पञ्च मुख होने का प्रमाण:- यह प्रमाण  पंचमुखी हनुमान कवच स्तोत्र में मिलता है:-

"पच्चवक्त्रं महाभीमं कपियूथसमन्वितम!
बाहुभिर्दशभिर्युक्त, सर्वकामार्थ सिद्धिदम !!२!!

श्री हनुमान जी का समस्त कामानाओं का देने वाला पांच मुखों का एवं दश भुजाओं से युक्त कपियूथ समन्वित भीमकात स्वरूप है!!"

हनुमानजी का पातळ लोक जाने का प्रमाण:- हनुमानजी के पाताल लोक जाकर अहिरावण से श्रीराम और लक्ष्मण को बंधन मुक्त कराने का प्रमाण हनुमान अष्टक में मिलता है:-

"बंधु समेत जबै अहिरावण, लै रघुनाथ पातळ सिधारो।
देविहिं पूजि भलि विधि सो बलि, देउ सबै मिलि मंत्र विचारो।
जाय सहाय भयो तब ही, अहिरावण सैन्य समेत संघारो।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकट मोचन नाम तिहारो।"


लंका युद्ध में रावण की असफलता:- जब श्रीराम-रावण युद्ध प्रारम्भ हुआ तब श्रीराम की वानर और भालुओ की सेना ने अद्भुद पराक्रम दिखाया और रावण के महाभट्टो को और अनेक राक्षसो को मार गिराया। धीरे धीरे रावण की सैन्य शक्ति कमजोर होती गई और उसके प्रमुख द्वार भी राम सेना ने ध्वस्त कर दिए।

अहिरावण से सहायता:- जब रावण ने देखा की अब युद्ध में सीधे राम से विजय पाना कठिन है तब उसने अपने पाताल लोग निवासी भाई अहिरावण से सहायता मांगी और एक दूत पातळ भेजा। अहिरावण परम मायावी था साथ ही उसे भवानी देवी का विशेष वरदान प्राप्त था।अहिरावण को तंत्र-मन्त्र के साथ सारी सिद्धियाँ प्राप्त थी। अहिरावण को जब यह बात पता चला की उसका भाई रावण संकट में है तब वह तुरंत उसकी सहायता के लिए लंका पहुच गया।

अहिरावण का मायाजाल:- अहिरावण ने योजना बनाई की श्रीराम सहित सारी सेना पर माया जाल फैलाया जाये अतः श्रीराम के दल में चला गया और वहा अपना माया जाल फैला दिया। उसके मया जाल से श्रीराम लक्ष्मण सहित सभी सेना गहरी निद्रा में चली गई। अहिरावण ने सोते हुए श्रीराम-लक्ष्मण को अपने साथ पातळ लोक ले गया। 

विभीषण का हनुमानजी को पाताल भेजना:- सेना की मूर्छा समाप्त हुई तब श्रीराम-लक्ष्मण को अपने निकट न पा कर श्रीराम की सेना में खलबली मच गई। इतने में विभीषण ने यह जान लिया की यह सारा मायाजाल रावण के भाई अहिरावण का रचा हुआ है। अतः विभीषण ने तुरंत हनुमानजी को जा कर सारा वृत्तांत बताया और पाताल लोक जा कर श्रीराम-लक्ष्मण को बंधन से मुक्त कराने के लिए प्रेरित किया। 

हनुमानजी का पातळ पहुच कर अपने पुत्र से युद्ध:- हनुमानजी ने जब यह जाना की श्रीराम को अहिरावण ने पातळ में ले गया है तुरंत पातळ लोक पहुच गए। पाताल लोक में पहुचने के बाद वहा उन्हें उनका पुत्र मकरध्वज मिला। मकरध्वज को युद्ध में हनुमानजी ने हरा दिया। और श्रीराम-लक्ष्मण के पास पहुच गए।

श्रीराम लक्ष्मण के बलि की तैयारी:- अहिरावण ने श्रीराम-लक्ष्मण को पातळ ले जाने के बाद अपने आराध्या भवानी के सामने बलि देने का निश्चय किया। इसके लिए उसने अपनी माया से दोनों को मूर्छित कर दिया था और भवानी के सामने यज्ञ आहुति दे रहा था। बलि दे कर वह भवानी को प्रसन्न करके और भी अधिक शक्तियाँ प्राप्त करना चाहता था।

अहिरावण के वध का रहस्य:- श्रीराम लक्ष्मण को बंधन मुक्त कराने के लिए अहिरावण का मारा जाना आवश्यक था। अहिरावण की मृत्यु तब तक संभव नहीं था जब तक भवानी के सम्मुख पांचो दिशाओ में जलने वाले दीपक को एक साथ न बुझाया जाये। 

हनुमानजी का पंचमुखी स्वरुप और अहिरावण वध:- हनुमानजी को एक युक्ति सूझी की एक मुख से तो यह कार्य संभव नहीं है अतः प्रभु को बंधन मुक्त कराने पांच मुख धारण करना पडेगा। 

अतः हनुमानजी ने श्रीराम की कृपा से उनके नाम का उच्चारण करते हुए देखते ही देखते पांच मुख धारण कर लिया। उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिम्ह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान (वानर) मुख धारण किया। 


"पैठी पाताल तोरि जम कारें ,
अहिरावण के भुजा उखारे।।"

इसके बाद हनुमानजी ने एक साथ पांचो दीपक को बुझा दिया और युद्ध अहिरावण की भुजाओं को उखाड़ दिया फिर अहिरावण को मार कर श्रीराम और लक्ष्मण को पातळ लोक से पुनः लंका के युद्ध क्षेत्र में वापस ले आये।

इसप्रकार हनुमानजी ने श्रीराम लक्ष्मण को अहिरावण से बंधन मुक्त कराने और अहिरावण के वध करने के लिए पाताल लोक में जा कर पांच मुख धारण किये और पंचमुखी कहलाये।
लेख - पं. आशुतोष चौबे
बिलासपुर (छ. ग.)

Friday, May 17, 2019

जानिये विभीषण की पत्नी और पुत्री ने श्रीराम की कैसे सहायता की?

रामायण काल में विभीषण जी एक बहुत प्रमुख पात्र है। विभीषण जी की एक पत्नी थी जिनका नाम था सरमा। सरमा एक गन्धर्व कन्या थी। विभीषण और सरमा की एक पुत्री थी जिसका नाम त्रिजटा था। विभीषण की ही भाति दोनों माँ-बेटी श्रीराम की अनन्य भक्त थी। जिस प्रकार युद्ध के समय विभीषण ने लंकापति रावण के अनेक भेद बता कर श्रीराम की सहायता की थी उसी प्रकार विभीषण की पत्नी सरमा और पुत्री त्रिजटा ने भी माता सीता की सहायता की थी आइये जाने कैसे:-

रावण माता सीता के प्रति आशक्त था और उनसे विवाह करके उन्हें अपनी रानी बनाना चाहता था। इस प्रयोजन को पूर्ण करने के लिए वह अनेक प्रकार की यातनाये माता सीता को दिया करता। परंतु माता सीता की पति के प्रति निष्ठा और समर्पण ने रावण के इस प्रयोजन को विफल बना दिया। 

अंत में रावण को एक योजना सूझी की क्यों न अपनी माया से एक कटा हुआ श्रीराम का शीश सीता के सामने रख दिया जाय और उसे यह बताया जाय की राम युद्ध में मारा गया तब निश्चय ही वह राम के प्रति अपने मोह को त्याग कर मुझे स्वीकार कर लेगी। रावण की सारी योजना का पता विभीषण पत्नी सरमा को चल गया और इसके पहले की रावण अपनी माया से यह भ्रम फैलाता सरमा ने जा कर सारा वृत्तांत सीता माता को सूना दी ताकि जब रावण श्रीराम के कटे हुए शीश को लेकर आये तब सीता माता विचलित न हो। तो इस प्रकार विभीषण पत्नी सरमा ने माता सीता की सहायता की।

विभीषण की पुत्री का नाम था त्रिजटा। जब रावण माता सीता का हरण करके लाया तब उन्हें अपनी अशोक वाटिका में एक वृक्ष के नीचे रक्खा था। उस अशोक वाटिका में जितनी राक्षसी थी उनमे प्रधान त्रिजिता थी। जब तक माता सीता अशोक वाटिका में रही त्रिजटा ने उन्हें अपनी पुत्री की भाँती रक्खा और माता सीता भी उन्हें माता कह कर संबोधित करती थी। त्रिजटा हमेशा माता सीता का मनोबल बढाती थी।

 एक बार माता सीता अपने प्राण त्यागने को उद्धत हो गई तब त्रिजटा ने अपने स्वप्न के बारे में बताया की 2-4 दिनों में ही एक राम दूत वानर यहाँ आयेगा और सारी अशोक वाटिका को उजाड़ कर पूरी लंका पूरी को आग से जला देगा साथ ही तेरी सुचना राम को जा कर देगा। त्रिजटा के इन वचनो को सुन कर माता सीता को फिर से आस बंधी उन्होंने अपना धैर्य पुनः प्राप्त किया।

इस प्रकार विभीषण जी अपने पत्नी और बेटी सहित श्रीराम जी की प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में समय समय पर सहायता किए।
     

हनुमानजी के पुत्र का जन्म कैसे हुआ?

श्रीराम को जब 14 वर्ष का वनवास हुआ तब वे पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वन में गए। वन में एक दिन धोखे से रावण ने सीता माता का हरण कर लिया। रामजी सीताजी की खोज कर रहे थे तभी उनकी भेंट हनुमान सुग्रीव आदि से हुई। 

वानर सेना सीता माता की खोज करने सभी दिशाओँ को गए। जिसमे दक्षिण दिशा में गई वानर सेना को सम्पाती ने समुद्र तट पर बताया की सीताजी 100 योजन दूर लंका में है। वानरो में निराशा छा गई की अब इस समुद्र को कौन लाँघ कर जाएगा। तब हनुमानजी को जामवंत जी ने उनकी शक्तियाँ याद दिलाई और समुद्र पार जाने को प्रेरित किया।

 हनुमानजी ने श्रीराम का नाम लेकर एक विशाल पर्वत से छलांग लगाईं और आकाश मार्ग से उड़ते हुए लंका पहुच गए। वहाँ जाकर सीता माता से भेंट कर रामजी का संदेशा सुनाया और अपनी क्षुधा शांत करने अशोक वाटिका को उजाड़ दिया। इस बात से क्रुद्ध हो कर रावण ने अपने बेटे अक्षय कुमार को भेजा जिसे हनुमानजी ने यमलोक पहुचा दिया फिर मेघनाद आया जिसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर हनुमानजी को बन्दी बना लिया और रावण के पास ले गए।

 रावण ने हनुमानजी की पूँछ में आग लगवा दी। हनुमानजी ने बदले में पूरी लंका को जला कर ख़ाक कर दिया जब पूरी लंका जल गई तब हनुमानजी अपनी पूँछ में लगी आग बुझाने के लिए समुद्र की तरफ बड़े। जब हनुमानजी समुद्र में अपने पूँछ में लगी आग बुझा रहे थे तब गर्मी के कारण उनके शरीर से पसीने की बूँद टपक रही थी। उनके शरीर से टपका एक बून्द पसीना एक मछली के मुँह में गिरा। उस पसीने के कारण उस मछली ने गर्भ धारण कर लिया।

रावण का एक भाई था अहिरावण जो पाताल में निवास करता था। एक बार उसके सैनिक भोजन के लिए उस मछली को पकड़ कर पाताल लोक चले गए। जब उस मछली को राक्षसो ने काटा तब उसमे से एक वानर निकला। सभी आश्चर्य में पड़ गए की मछली के पेट से वानर कैसे निकल सकता है। 

बात अहिरावण तक पहुची तब अहिरावण ने उस वानर का नाम मकरध्वज रखा। मकरध्वज बहुत ही बलशाली था अतः अहिरावण ने उसे अपने पाताल लोक का द्वारपाल नियुक्त किया। आगे चल कर राम रावण युद्ध के दौरान जब अहिरावण छल से राम लक्ष्मण का हरण कर पातळ ले आया तब हनुमानजी उन्हें बंधक मुक्त कराने पातळ आये जहा द्वार पर उनकी भेंट अपने पुत्र मकरध्वज से हुई। उन दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंत में हनुमानजी की विजय हुई और हनुमानजी ने अहिरावण का वध कर राम लक्ष्मण को बंधन मुक्त कराया। उसके बाद श्रीराम ने मकरध्वज को पातळ लोक का राजा बना कर वहाँ शासन करने की आज्ञ दी। 

स प्रकार हनुमानजी को ब्रह्मचारी होते हुए भी एक पुत्र हुआ और उससे उन्हें युद्ध भी करना पड़ा था।
                    ।। जय श्रीराम।।
                   ।। जय हनुमान।।
लेख - पं. आशुतोष चौबे
बिलासपुर (छ. ग.)

जन्म के समय होते है तीन प्रकार के अप-शगुन!!

हमारे इस संसार में हम प्रायः समय-समय पर शगुन-अपशगुन की बात करते है। उदाहरण के लिए यदि कोई यात्री यात्रा पर निकल रहा हो, तो तीन बातें अपशगुन मानी जाती है:-छींकना, रोना और टोकना। अर्थात हमारे यात्रा में निकलते समय यदि कोई छींक दे अथवा रो रहा हो अथवा कोई हमें टोक दे, तो हम उसे अपशगुन मान लेते है और तुरंत कुछ न कुछ उसके निवारण का उपाय करते है, फिर अपनी यात्रा प्रारम्भ करते है।

इसी प्रकार जब जीव अपनी जीवन यात्रा प्रारम्भ करते है तब भी यहि तीन प्रकार के अपशगुन होते है। बच्चा जब जन्म लेता है तब सबसे पहले छींकता है, फिर रोता है, और सगे-संबंधी क्या हुआ? क्या हुआ? (अर्थात लड़का हुआ या लड़की) करके टोकते है।

जिस प्रकार अपशगुन हो जाय तो कोई न कोई निवारण कर हम अपनी यात्रा प्रारम्भ करते है उसी प्रकार जीवन यात्रा में भी जीव के जन्म लेते ही तीन प्रकार के अपशगुन एक साथ हो रहे है तब तो मामला गंभीर हो जाता है। अतः हमें जन्म के समय भी होने वाले तीनो अपशगुनो का भी निवारण कर लेना चाहिए।

इसका अपशगुन का परिणाम यह होता है की जीव इस संसार के भवसागर में डूब जाता है और "मैं ते मोर तोर ते माया" तेरा-मेरा करते हुए माया के चक्कर में पड़ जाता है। इसके बाद उसके जीवन में काम क्रोध लोभ मोह आदि अनेक प्रकार की बीमारिया उसे घेर लेती है। माया का जाल इतना प्रबल हो जाता है की जीव अपने वास्तविक स्वरुप को भूल कर उस परमात्मा से विमुख हो जाता है और इस संसार को ही अपना जान कर इसमें सुख ढूंढने लगता है और दुःख को प्राप्त करता है। 

जीव को चाहिए कि जैसे ही उसे बोध हो, वह भगवान् की भक्ति प्रारम्भ कर दे और सभी अपशगुन का निवारण करे, ताकि जीव इन अपशगुनो से होने वाली बीमारियो से बच सके और परमात्मा से अपना नित्य सम्बन्ध स्थापित कर उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। संसार अनित्य है, माया जनित है, ऐसा जान कर जब जीव भगवान् के तरफ अभिमुख होता है तब भगवान् माया और माया जनित सभी विकारो से जीव की रक्षा करते है और जीव एक सार्थक जीवन व्यतीत कर अंत में भगवान् को प्राप्त कर लेता है।

इस लेख का सार यह है कि सांसारिक शगुन-अपशगुन के चक्कर मे जीव को नही पड़ना चाहिए क्योकि जीव का जन्म ही अपशगुन के साथ होता है, इस संसार मे उसी जीव का जीवन सार्थक है जो मनुष्य योनि को साधन बनाकर अपने भगवत भक्ति से ईश्वर को प्राप्त कर लेते हैं।

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