Monday, May 20, 2019

शुन्य है जीवात्मा तो अंक है परमात्मा जाने कैसे?

एक बार की बात है अंक और शून्य आपस में बैठे हुए थे। शून्य ने अंक से कहा कि मेरे कारण ही कारण तू बड़ा बनता है। जैसे-जैसे मैं तेरे पीछे लगता हूँ तू दस गुना बढ़ता जाता है । उदाहरण के लिए 1 के आगे 0 लगा तो 10 हो गया 10 के आगे 0 लगा तो 100 हो गया, कहने का अर्थ है की 0 के लगने से अंक की शक्ति दस गुनी बड़ जाती है। 

तभी अंक ने कहा की तू चाहे मेरे पीछे जितनी बार भी लग ले पर यदि मैं तेरे सामने से हट गया तो तेरा कोई अर्थ नहीं है अर्थात यदि 10000000 में से केवल 1 हो हटा दिया जाय तो बाकी के सभी शून्य का कोई महत्त्व नहीं बचत वह केवल शून्य हो जाता है।

इसी प्रकार जीवात्मा और परमात्मा के लिए कहा गया है:-

राम नाम को अंक है, सब साधन है शून्य।
अंक गए कछु हाथ ना, अंक रहे दश गुन।।

इसी प्रकार का कुछ सम्बन्ध जीवात्मा और परमात्मा में भी है। अंक परमात्मा है और शून्य जीवात्मा। जब तक शून्य रूपी जीवात्मा के भीतर भगवान् रुपी अंक की शक्ति है तब तक ही जीवात्मा का अस्तित्व है, जिस दिन भगवान् अपनी शक्ति हमारे सामने से खीच लेंगें उस दिन हमारा अस्तित्व समाप्त हो जायगा। 

यह शरीर एक मशीन की तरह है जिसमे विविध प्रकार के उपकरण (पंच ज्ञानेन्द्रियाँ, पंच कर्मेन्द्रियाँ, पांच प्राण, मन, बुद्धि और अहंकार) लगे हुए है। जिस प्रकार लौकिक उपकरणों को संचालित करने के लिए विद्युत शक्ति की आवश्यकता होती है उसी प्रकार शरीर के इन उपकरणों को भी संचालित करने के लिए ईश्वर के अंश रूपी जीव शक्ति की आवश्यकता होती है। जब तक इस शरीर मे उस ईश्वर की शक्ति रूपी जीव का निवास है तभी तक इस शरीर का अस्तित्व है, जिस दिन यह शक्ति भगवान इस शरीर से निकाल लेते है उस दिन बड़े से बड़ा ज्ञानी, बलवान, रूपवान सभी मिट्टी के ढेर के रूप में परिणित हो जाते है।

अतः कभी अपने रूप, सौंदर्य, धन-दौलत, मान-सम्मान, गुण, ज्ञान आदि का अहंकार नहीं करना चाहिए। सभी कुछ भगवान् का दिया है और उनकी कृपा से ही मिला है, हमारा इसमें कुछ भी नहीं यह भावना मन में रखन चाहिए। कर्म और ज्ञान का अहंकार करने वालो का पतन निश्चित होता है। इसप्रकार भगवान सर्व शक्तिमान है, सर्वाज्ञ है, सर्व नियन्ता है, सर्वव्यापी है उनकी कृपा से ही जीव का अस्तित्व है। ईश्वर की शक्ति बिना जीव शून्य की ही भाँती है।


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